रानी लक्ष्मीबाई के वीरगति को प्राप्त होने के बाद उनके बेटे के साथ जो हुआ वो जानकर आपकी आँखे भर आयेगी

बुंदेले हर बोलों के मुंह, हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानीथी…. सुभद्रा कुमारी चौहान की यह पंक्तियां आज भी न केवल महारानी लक्ष्मीबाई कीवीरगाथा बयां करती हैं, बल्कि इनको पढ़ने गुनगुनाने मात्र से मन में देशभक्ति का एकअद्भुत संचार हो उठता है|महिला सशक्तिकरण के इस दौर में भला युवतियों और महिलाओं के लिए रानी लक्ष्मीबाई से अधिक बड़ा प्रेरणास्रोत कौन हो सकता है, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले काल में महज23 साल की आयु में ही अपने राज्य की कमान संभालते हुए अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे।

1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लोहा लेने वाली वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई लड़ाई में सिर्फ झांसी की रानी और उनके दुश्मन ही नहीं थे बल्कि उनका एक नन्हा सा बेटा भी था. जो लड़ाई में महारानी की पीठ पर बंधा रहता था. जिसका नाम दामोदर राव था. जिसे झांसी के महाराजा गंगाधर राव और लक्ष्मीबाई नेवलकर (झांसी की रानी का पूरा नाम) ने गोद लिया था. पर क्या आप जानते है रानी की मौत के बाद दामोदर का क्या हाल हुआ. अंग्रेजों ने उन्हें दर-दर भटकने को मजबूर कर दिया था.

अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी|1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा. महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से बहुत ही कठिन जीवन जिया. उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ अंग्रेज ही नहीं हिंदुस्तान के लोग भी थे

रानी लक्ष्मी बाई के बेटे  के मृत्यु कैसे हुई ,जाने अगले पेज पर :

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