फीस भरने को नहीं थे पैसे, बच्चों को पढ़ाने के लिए की मजदूरी, बहाया पसीना, आज इस मां का बेटा है SDM

जो हमारे जीवन के हर सुख-दुख में हमारा साथ देती है वह हमारी मां ही होती है। मां हमें कभी भी इस बात का एहसास नहीं होने देती कि संकट की घड़ी में हम अकेले हैं। इसी वजह से हमारे जीवन में मां के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। मां एक ऐसा शब्द है, जिसके महत्व के विषय में जितनी भी बात की जाए कम ही है। हम मां के बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। आप सभी लोग मां की महानता का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि इंसान भगवान का नाम लेना भले ही भूल जाए लेकिन मां का नाम लेना नहीं भूलता।

कहते हैं कि भगवान हर जगह नहीं रह सकते, इसी वजह से उसने सब के लिए मां बनाई है। एक मां अपने बच्चे से बेहद प्रेम करती है। उसका बच्चा चाहे जैसा भी हो, उसका बच्चा ही होता है। अपने बच्चे को 9 महीने पेट में और 2 साल सीने से लगाकर मां रखती है। तब जाकर उसका बच्चा चल पाता है और बोल पाता है। सच में मां के लिए तो शब्द कम पड़ जाएंगे। मां खुद की परवाह ना करते हुए अपने बच्चे की अच्छी तरीके से देखभाल करती है।

भले ही मां के पास कुछ ना हो परंतु वह अपने बच्चे के लिए वह सब कुछ करती है, जो वह कर सकती है। मां हमेशा चाहती है कि उसका बच्चा खूब तरक्की करे और खुश रहें। इसी बीच आज हम आपको राजस्थान की शांति देवी की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने कभी स्कूल तक नहीं देखा, परंतु अपने बच्चों को पढ़ाने और कुछ बनने के लिए काफी ज्यादा प्रेरित किया।

शांति देवी के पास बच्चों की फीस भरने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने मजदूरी की, पसीना बहाया। उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य को संवारने में किसी भी प्रकार की कसर नहीं छोड़ी। आज इस मां का एक बेटा राजस्थान एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (RAS) अधिकारी है। आज वह एक SDM की मां कहलाती है।

मजदूरी कर बच्चों को पढ़ाया

आपको बता दें कि शांति देवी राजस्थान के सीकर जिले में खंडेला इलाके के दुल्हेपुरा की रहने वाली हैं। उनके 5 बच्चे हैं। उन्होंने अपने बच्चों के लिए जीवन में काफी संघर्ष किया है। उनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी परंतु उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आने दी। भले ही आर्थिक तंगी में उनका परिवार जी रहा था परंतु उन्होंने अपने बच्चों को खूब पढ़ाने का ठान लिया।

किसी भी परिस्थिति में उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। शांति देवी ने अपने बच्चों की खातिर खेतों में मजदूरी का काम किया। उन्हें अपने बच्चों पर पूरा भरोसा था कि वह एक दिन कुछ बनकर उनका नाम रोशन करेंगे। बस यही वजह है कि कड़ी धूप में शांति देवी मजदूरी का काम करतीं और उन्होंने बच्चों को पढ़ाया। उन्होंने अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए कोई कसर बाकी नहीं रहने दी।

फीस भरने के भी पैसे नहीं थे

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो शांति देवी अपने बच्चों को एक ही बात कहा करती थीं कि अगर तुम सब पढ़ लिखकर काबिल बन जाओगे, तो उन्हें मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी। बच्चों ने भी अपनी मां का दर्द समझा और वह जी तोड़ मेहनत से पढ़ाई में जुटे रहे। प्राप्त जानकारी के अनुसार शांति देवी मजदूरी करके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया करती थीं। कभी-कभी तो ऐसा भी हो जाता था कि उनके पास अपने बच्चों की फीस भरने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। ऐसी स्थिति में वह अपने पालतू पशुओं को बेचती थीं, तो कभी पेड़ों को बेचकर बच्चों की फीस भरती थीं।

शांति देवी ने अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए जीवन में बहुत संघर्ष किया है। उन्होंने अपने सामने आने वाली हर मुश्किलों का सामना डटकर किया है। वहीं उनके बच्चों ने भी उन्हें निराश नहीं होने दिया। आखिर में उनकी मेहनत का फल उनको मिलने लगा।

वो दिन आ ही गया जब उनके बच्चों ने उनका नाम किया रौशन

आपको बता दें कि शांति देवी का एक बेटा धर्मराज रुलानियां नर्सिंग ऑफिसर हैं। वह एसएमएस अस्पताल जयपुर में कार्यरत हैं। वहीं उनके छोटे बेटे हुक्मीचंद ने भी अपनी मां के सपनों को साकार करने के लिए जीवन में खूब मेहनत किया। वह एक होनहार छात्र थे। कक्षा 8 से लेकर 12वीं तक लगातार टॉप करते रहे। उन्होंने सीकर के नवजीवन साइंस स्कूल से पढ़ाई करते हुए इंटरमीडिएट की परीक्षा में पूरे प्रदेश में 7वीं रैंक प्राप्त की। उन्होंने अपने परिवार के साथ साथ पूरे जिले का नाम रोशन किया। इसके आगे उन्होंने बीटेक की डिग्री हासिल की।

लेकिन हुक्मीचंद रुमनियां अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहते थे जिसके चलते वह प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी में जुट गए। उन्होंने दिन रात एक कर दी और काफी कठिन मेहनत की। तब जाकर साल 2018 में राजस्थान प्रशासनिक सेवा परीक्षा में 18वीं रैंक हासिल की। आज वह RAS (Rajasthan Administrative Services) अधिकारी बने। हुक्मीचंद ने अपनी मां के सपनों को पूरा किया और उनके विश्वास को जीत दिलाई। आज पूरे गांव में उनकी मां को लोग SDM अधिकारी की मां कहते हैं।